राम यात्रा आरंभ
यात्रा का न आदि...न अंत...यात्रा होती है अनंत...
अयोध्यावासी दीपावली की तैयारी कर रहे हैं, राजा राम, महारानी सीता और ओजस्वी, कर्मठ लक्ष्मण लौटने वाले हैं. हर साल यूं ही होता है, लोग दशहरा पर रावण जलाते हैं और दीपावली पर दीये और पटाखे. लेकिन अयोध्यावासियों से दूर पुष्पक विमान में बैठे राम, लक्ष्मण और सीता, हनुमान, जामवंत और कई वानर सैनिकों के मन में क्या चल रहा होगा.. रीतिकाल में इस दौरान को प्रेम रस में डूबा दिखाया गया है अमीष इस काल को वास्तविकता से जोड़ते हैं और राम, सीता के घावों और उनकी चोट की विस्तार से बात करते हैं.... वाल्मीकि इस यात्रा पर ज्यादा ध्यान नहीं देेते - रावण वध के बाद वो सिर्फ मुख्य घटनाओं और बेहतर जीवन की चर्चा करते हैं...
लेकिन मैं सोचता हूंं - क्या सोचते होंगे राम? क्या वो डरते नहीं होंगे? क्या उनमें दंभ, राग, द्वेष और वियोग की भावनाएं नहीं आती होंगी?
क्या सोचते होंगे लक्ष्मण, क्या उनके शरीर में घावों का दर्द नहीं होगा? मूर्छित होने के बाद लक्ष्मण के किसी पराक्रम की कहानी नहीं आती, क्या इस मूर्च्छा और संजीवनी के प्रयोग के बाद वो बदल गए थे?
क्या डर के बार बार नींद से उठ नहीं जाती होंगी सीता? क्या उन्हें नहीं लगता होगा कि अभी किसी कोने से निकल आएगा रावण?
हनुमान को नींद नही आती होगी, आते होंगे युद्ध की विभीषका के सपने और दर्द होते होंगे शरीर में लगे कई घाव...
पुष्पक विमान का माहौल मनोरम नहीं होगा...दवाओं की महक और चेहरे पर थकान लिए इन योद्धाओं को देखना डरावना लगता होगा...
अयोध्यावासी तो स्वागत की तैयारी कर रहे हैं लेकिन क्या चलता होगा पुष्पक विमान में - उसी यात्रा का वृतांत है -
राम यात्रा श्रृंखला
जय महाविष्णु!!
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