राम यात्रा - भाग 02


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यात्रा का न आदि...न अंत...यात्रा होती है अनंत...

पुष्पक विमान, चौकोर आकार का वो विमान तेज़ गति से उड़ रहा था. विमान में नीचे की ओर हर कोने पर चार पंखे लगे हुए थे जो हवा में इसे संतुलन देते थे और विमान का मुख्य पंखा तेज़ गति से घूम रहा था. इसकी गड़गड़ाहट दूर तक सुनी जा सकती थी. विमान के अंदर बैठे लोगों के लिए स्थिति आरामदायक थी. वो एक ऐसी धातु के अंदर थे जिससे शोर और हवा पार नहीं हो सकती. पुष्पक विमान - वो सतयुग में अभियांत्रिकी का एक बेमिसाल नमूना था. जो पहले कुबेर, फिर रावण और फिर राम के पास था...

पर यही इस बात का सबूत था कि वो विमान मनहूस है...इसे इस्तेमाल करने वाला ज्यादा दिन सुखी नहीं रहा...

"मनहूस विमान..." और लक्ष्मण ने घृणा से अपनी नज़रें फिर बाहर फेर ली

लक्ष्मण इस विमान के एक कोने पर बैठे थे. इस कोने में एक झरोखा था जिससे कभी लक्ष्मण विमान के अंदर और कभी बाहर देखते. वो याद कर रहे थे बीते कुछ दिनों का एक एक क्षण. उन्हें गुस्सा आता है - लगभग हर रोज़... वो उस दिन अपना वार न चूकते तो कुछ नहीं होता...

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शूर्पणखा की गर्दन पर ही वार किया था उन्होंने, लेकिन वो तेज तर्रार राक्षसी लक्ष्मण को झांसा देकर निकल गई. हालांकि चाकू का वो वार राक्षसी के चेहरे पर लगा था, शायद उसकी नाक पर...

लक्ष्मण उस दिन को भी कोसते हैं जब वो भाभी की बात सुनकर बाहर निकले. "मनहूस दिन..."

पहले खुद पर और फिर भाभी पर, लक्ष्मण को बस गुस्सा आता है...  उन्होंने मेरी बात क्यों नहीं मानी?

लक्ष्मण, राजा राम के छोटे भाई, डील डौल में वो हनुमान की बराबरी करते थे. बस हनुमान को एक प्राचीन कला आती थी और वो अपने शरीर को कुछ ऐसा खींच लेते की अपने आकार से और भी बड़े लगते थे. लक्ष्मण कमाल के धर्नुधर थे और बेहद गुस्सैल. लेकिन मेघनाद के बाण लगने के बाद से वो पहले जैसे नहीं रह गए थे.

संजीवनी से उन्हें जीवनदान मिला था लेकिन जीवन का मोल भी उनको समझ आया था. उस मूर्च्छा के दौरान उन्हें बस सुनाई पड़ रही थी आसपास की आवाज़ें और बंद आँखो के पीछे, गहरे मस्तिष्क में, याद आ रही थी प्यारी अयोध्या...

याद आती थी मां, पिता का महल और याद आती थी उर्मिला...वो युद्ध के कोलाहल से दूर किसी शांत सरोवर के किनारे बैठी उर्मिला को देख रहे थे...शांत... लक्ष्मण का गुस्सा शांत हो गया था...संजीवनी ने उन्हें जीवनदान दिया था लेकिन जीवन का बदलाव भी...

लक्ष्मण अब समझते थे कि हर बात को गुस्से और युद्ध से ठीक नहीं किया जा सकता. जीवन अनमोल है. वो मृत्यु शैय्या पर पड़े रावण से भी शिक्षा ले चुके थे. वो ज्ञान का महत्व समझ रहे थे.

वो जानते थे कि अयोध्यावासी उनके आने के लिए स्वागत की तैयारी कर रहे होंगे. रावण वध की सूचना बहुत पहले अयोध्या पहुंच चुकी थी. लोग खुश थे, भरत भी मन ही मन अपने भाई राम को ही राजा मानते थे ऐसे में किसी को कोई संशय नहीं था.

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लेकिन लक्ष्मण के मन में संशय था, क्या अयोध्या उन्हें स्वीकार करेगी?

वो जो अपनी भाभी की रक्षा नहीं कर सके?

वो जो युद्ध के मैदान में बेहोश हो गए?

वो जो एक राक्षसी का एक ही वार में अंत न कर सके?

लक्ष्मण को फिर गुस्सा आने लगा था. संजीवनी के उपचार के बाद से उनके बाल झड़ रहे थे और वो दिन भर थका हुआ महसूस करते थे. ये उनके तनाव को और बढ़ाता था.

तभी उनके कंधे पर किसी का हाथ आ रुका, वो बड़ा हाथ, वो बड़ा बालों वाला हाथ, वो इसे पहचानते थे, वो हनुमान थे. हनुमान, शांत, सौम्य, विशाल और लक्ष्मण के मार्गदर्शक. जहां राम के लिए वो मित्र थे वहीं लक्ष्मण के लिए किसी बड़े सहोदर के समान.

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सिर्फ वही थे जो युद्ध के बीच तेज गति से कूद फांद करते एक ऊंचे पहाड़ से संजीवनी ला सकते थे. वो लाए भी थे, लक्ष्मण के प्राण बचाने वाले हनुमान.

"तुम फिर गुस्सा कर रहे हो लक्ष्मण, इससे तुम्हारी सेहत पर विपरीत प्रभाव होगा. संजीवनी के बाद से गुस्सा तुम्हारे लिए वर्जित है." राम-रावण युद्ध का ये तीसरा नायक हनुमान ही था. उनके शरीर पर अधपके बाल थे और जगह जगह खरोंच के निशान थे. उन्होंने लक्ष्मण को फिर से लेट जाने को कहा. संजीवनी ने अपना असर दिखाया और लक्ष्मण को लेटते ही पहले सिर भारी महसूस हुआ और तुरंत उन्हे नींद आ गई.

हमें विमान को पहले किष्किंधा ले जाना होगा प्रभु, लक्ष्मण को संजीवनी की दूसरी खेप देनी होगी. वो ठीक नहीं हैं...

राम ... वो वहीं थे... वो जानते थे कि हनुमान सही कह रहे हैं... अयोध्या अभी दूर है और लक्ष्मण को उपचार की ज़रूरत है...इस युद्ध ने बहुत कुछ बदल दिया था ...

"प्रभु, हमें किष्किंधा जाना होगा..." हनुमान ने याचना की

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राम चुप थे, पुष्पक विमान, दवाओं की महक, थके हुए योद्धा, ये मनोरम दृश्य नहीं था... अयोध्यावासी दीप जलाने की तैयारी में थे और राम का दल युद्ध के बाद आने वाली विभीषिका में जल रहा था.

"प्रभु...किष्किंधा...लक्ष्मण" ये भारी स्वर जामवंत का था...

राम की चेतना लौटी, "हां, किष्किंधा..."

हनुमान अपने अराध्य, अपने प्रिय मित्र को देख रहे थे... वो सोचने लगे.... क्रमश:

जय प्रभु विष्णु! 


Comments

  1. आशुतोष राणा के बाद किसी दूसरे ने राम पर इतना सुन्दर लिखा है. आगे की कड़ियों का इंतज़ार रहेगा.

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  2. Bauhat Badiya Sushant ji

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